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ramayan 2.105.31: जैसे नदियों का प्रवाह पीछे नहीं लौटता, वैसे ही दिन-प्रतिदिन क्षीण होती हुई स्थिति भी पीछे नहीं लौटती। उसे क्रमशः नष्ट होता हुआ समझकर, कल्याण के साधनरूप धर्म में आत्मा को लगाना चाहिए; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं॥31॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.105.31 
वयस: पतमानस्य स्रोतसो वानिवर्तिन:।
आत्मा सुखे नियोक्तव्य: सुखभाज: प्रजा: स्मृता:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जैसे नदियों का प्रवाह पीछे नहीं लौटता, वैसे ही दिन-प्रतिदिन क्षीण होती हुई स्थिति भी पीछे नहीं लौटती। उसे क्रमशः नष्ट होता हुआ समझकर, कल्याण के साधनरूप धर्म में आत्मा को लगाना चाहिए; क्योंकि सभी लोग अपना कल्याण चाहते हैं॥31॥
 
‘Just as the flow of rivers does not turn back, similarly the condition which is declining day by day does not turn back. Thinking that it is gradually getting destroyed, one should engage the soul in religion which is the means of welfare; because all people want their own welfare.॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)