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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.105.24 
नन्दन्त्युदित आदित्ये नन्दन्त्यस्तमितेऽहनि।
आत्मनो नावबुध्यन्ते मनुष्या जीवितक्षयम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
‘लोग सूर्योदय पर प्रसन्न होते हैं, वे सूर्यास्त पर भी प्रसन्न होते हैं; परंतु वे यह नहीं जानते कि उनका जीवन प्रतिदिन नष्ट हो रहा है।॥24॥
 
‘People are happy at the sunrise, they are also happy at the sunset; but they do not know that their lives are being destroyed every day.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)