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ramayan 2.105.19: 'जो रात बीत जाती है, वह लौटकर नहीं आती। जैसे यमुना नदी जल से भरे हुए समुद्र की ओर बहती है और वहाँ से लौटकर नहीं आती।॥19॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.105.19 
अत्येति रजनी या तु सा न प्रतिनिवर्तते।
यात्येव यमुना पूर्णं समुद्रमुदकार्णवम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'जो रात बीत जाती है, वह लौटकर नहीं आती। जैसे यमुना नदी जल से भरे हुए समुद्र की ओर बहती है और वहाँ से लौटकर नहीं आती।॥19॥
 
‘The night that passes does not return. Just as the river Yamuna flows towards the water-filled ocean and does not return from there.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)