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ramayan 2.105.16: 'संग्रह का अंत विनाश है। सांसारिक उन्नति का अंत पतन है। संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है।॥16॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.105.16 
सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छ्रया:।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'संग्रह का अंत विनाश है। सांसारिक उन्नति का अंत पतन है। संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मृत्यु है।॥16॥
 
‘The end of all collections is destruction. The end of worldly advancements is downfall. The end of union is separation and the end of life is death.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)