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ramayan 2.105.14: तब महायशस्वी भरत को इतना दुःखी और विलाप करते देख, अत्यन्त धैर्यवान और विद्वान् बुद्धि वाले भगवान् श्री रामजी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-॥14॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.105.14 
तमेवं दु:खितं प्रेक्ष्य विलपन्तं यशस्विनम्।
राम: कृतात्मा भरतं समाश्वासयदात्मवान्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
तब महायशस्वी भरत को इतना दुःखी और विलाप करते देख, अत्यन्त धैर्यवान और विद्वान् बुद्धि वाले भगवान् श्री रामजी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा-॥14॥
 
Then, seeing the illustrious Bharata so sad and wailing, Lord Shri Ram, who was extremely patient and had an educated mind, consoled him and said – ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)