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ramayan 2.105.13: भरतजी द्वारा श्री रामजी से राजसिंहासन स्वीकार करने की प्रार्थना करते हुए कहे गए वचन सुनकर नगर के विभिन्न लोगों ने उसका हृदय से अनुमोदन किया ॥13॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.105.13 
तस्य साध्वनुमन्यन्त नागरा विविधा जना:।
भरतस्य वच: श्रुत्वा रामं प्रत्यनुयाचत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भरतजी द्वारा श्री रामजी से राजसिंहासन स्वीकार करने की प्रार्थना करते हुए कहे गए वचन सुनकर नगर के विभिन्न लोगों ने उसका हृदय से अनुमोदन किया ॥13॥
 
Having heard Bharata's words while praying to Sri Rama to accept the throne, the various people of the city approved of it wholeheartedly. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)