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ramayan 2.105.1-2: अपने मित्रों से घिरे हुए, पुरुषसिंह और श्री राम ने उस रात को पिता के निधन पर शोक मनाते हुए बिताया। प्रातःकाल भरत सहित तीनों भाई अपने मित्रों के साथ मंदाकिनी के तट पर गए और स्नान, होम, जप आदि करके श्री राम के पास लौट आए॥1-2॥   |   ramayan सर्ग 2.105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 105: भरत का श्रीराम को राज्य ग्रहण करने के लिये कहना, श्रीराम का पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये ही राज्य ग्रहण न करके वन में रहने का ही दृढ़ निश्चय बताना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  2.105.1-2 
तत: पुरुषसिंहानां वृतानां तै: सुहृद्‍गणै:।
शोचतामेव रजनी दु:खेन व्यत्यवर्तत॥ १॥
रजन्यां सुप्रभातायां भ्रातरस्ते सुहृद्‍वृता:।
मन्दाकिन्यां हुतं जप्यं कृत्वा राममुपागमन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
अपने मित्रों से घिरे हुए, पुरुषसिंह और श्री राम ने उस रात को पिता के निधन पर शोक मनाते हुए बिताया। प्रातःकाल भरत सहित तीनों भाई अपने मित्रों के साथ मंदाकिनी के तट पर गए और स्नान, होम, जप आदि करके श्री राम के पास लौट आए॥1-2॥
 
Surrounded by their friends, the brothers Purushsingh and Shri Ram spent that night mourning the death of their father. In the morning, the three brothers including Bharat went to the banks of the Mandakini along with their friends and after taking bath, performing homa and chanting, etc., returned to Shri Ram.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)