श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 104: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के द्वारा माताओं की चरणवन्दना तथा वसिष्ठजी को प्रणाम करके श्रीराम आदि का सबके साथ बैठना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.104.5 
इत: सुमित्रे पुत्रस्ते सदा जलमतन्द्रित:।
स्वयं हरति सौमित्रिर्मम पुत्रस्य कारणात्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रे! आपका पुत्र लक्ष्मण बिना किसी आलस्य के स्वयं ही यहाँ आता है और मेरे पुत्र के लिए सदैव जल लाता है।॥5॥
 
'Sumitre! Your son Lakshmana, without any laziness, himself comes here and always brings water for my son. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)