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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन
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श्लोक 30
श्लोक
2.103.30
इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम्।
यदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता:॥ ३०॥
अनुवाद
महाराज! इस भोजन को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें; क्योंकि आजकल हमारा आहार यही है। मनुष्य जो अन्न खाता है, उसके देवता भी वही खाते हैं।॥30॥
‘Maharaj! Please accept this food happily; because this is our diet these days. The food that a man eats, his gods also consume the same.'॥ 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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