श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.103.21 
सीता पुरस्ताद् व्रजतु त्वमेनामभितो व्रज।
अहं पश्चाद् गमिष्यामि गतिर्ह्येषा सुदारुणा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
"सीता आगे चलें। आप उनके पीछे चलें और मैं आपके पीछे चलूँगा। शोक के समय यही रीति है, जो अत्यंत दुःखदायी है।" ॥21॥
 
"Sita should go ahead. You should follow her and I will follow you. This is the custom during times of mourning, which is extremely painful." ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)