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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन
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श्लोक 17
श्लोक
2.103.17
ततस्ते भ्रातर: सर्वे भृशमाश्वास्य दु:खितम्।
अब्रुवञ्जगतीभर्तु: क्रियतामुदकं पितु:॥ १७॥
अनुवाद
तत्पश्चात सब भाइयों ने दुःखी श्री रामचन्द्रजी को सान्त्वना देते हुए कहा - 'भैया! अब पिता पृथ्वीपति के निमित्त जल का दान करो॥17॥
After that, all the brothers consoled the sad Shri Ramchandraji and said - 'Brother! Now donate water for father Prithvipati. 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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