श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 103: श्रीराम आदि का विलाप, पिता के लिये जलाञ्जलि-दान, पिण्डदान और रोदन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.103.12 
समाप्तवनवासं मामयोध्यायां परंतप।
कोऽनुशासिष्यति पुनस्ताते लोकान्तरं गते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'परंतप भरत! यदि मैं वनवास पूरा करके अयोध्या चला जाऊँगा, तो मुझे कर्तव्य का उपदेश कौन देगा? क्योंकि पिता का स्वर्गवास हो चुका है।' 12॥
 
‘Parantap Bharat! If I go to Ayodhya after completing my period of exile, then who will teach me about duty? Because father has passed away. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)