श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  2.100.75 
कच्चित् स्वादुकृतं भोज्यमेको नाश्नासि राघव।
कच्चिदाशंसमानेभ्यो मित्रेभ्य: सम्प्रयच्छसि॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! क्या आप अकेले ही स्वादिष्ट भोजन नहीं खाते? क्या आप अपने उन मित्रों को भी देते हैं जो उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं?॥ 75॥
 
‘Raghunandan! Don’t you eat the delicious food alone? Do you give it to your friends who are expecting it too?॥ 75॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)