श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  2.100.58 
व्यसने कच्चिदाढॺस्य दुर्बलस्य च राघव।
अर्थं विरागा: पश्यन्ति तवामात्या बहुश्रुता:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
'रघुकुलभूषण! यदि किसी धनी और निर्धन व्यक्ति में झगड़ा हो जाए और वह निर्णय के लिए राज्य-दरबार में आ जाए, तो आपके परम ज्ञानी मंत्री धन आदि का लोभ छोड़कर उस विषय पर विचार करते हैं, है न?॥ 58॥
 
'Raghukulabhushan! If a dispute arises between a rich and a poor person and it comes to the state court for decision, then your very knowledgeable minister considers the matter leaving aside the greed for money etc., isn't it?॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)