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सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना
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श्लोक 54
श्लोक
2.100.54
आयस्ते विपुल: कच्चित् कच्चिदल्पतरो व्यय:।
अपात्रेषु न ते कच्चित् कोषो गच्छति राघव॥ ५४॥
अनुवाद
‘रघुनन्दन! क्या आपकी आय अधिक और व्यय बहुत कम है? क्या आपके राजकोष का धन अयोग्य लोगों के हाथ में तो नहीं जा रहा है?॥ 54॥
‘Raghunandan! Is your income more and expenditure very less? Is the wealth of your treasury not going into the hands of unworthy people?॥ 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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