श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.100.32 
कच्चिद् बलस्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्।
सम्प्राप्तकालं दातव्यं ददासि न विलम्बसे॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
क्या आप सैनिकों के लिए निर्धारित उचित वेतन और भत्ते समय पर देते हैं? क्या आप उन्हें देने में विलम्ब नहीं करते?॥32॥
 
‘Do you pay the appropriate salary and allowances fixed for the soldiers on time? Do you not delay in paying them?॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)