श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 100: श्रीराम का भरत को कुशल-प्रश्न के बहाने राजनीति का उपदेश करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.100.13 
कच्चिद् देवान् पितॄन् भृत्यान् गुरून् पितृसमानपि।
वृद्धांश्च तात वैद्यांश्च ब्राह्मणांश्चाभिमन्यसे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
तात! क्या तुम देवताओं, पितरों, सेवकों, गुरुजनों, पितातुल्य वृद्धजनों, वैद्यों और ब्राह्मणों का आदर करते हो? 13॥
 
‘Tat! Do you respect the gods, ancestors, servants, teachers, father-like elders, doctors and Brahmins? 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)