श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 31-32h
 
 
श्लोक  2.10.31-32h 
कस्य वापि प्रियं कार्यं केन वा विप्रियं कृतम्॥ ३१॥
क: प्रियं लभतामद्य को वा सुमहदप्रियम्।
 
 
अनुवाद
'अथवा यह बताओ कि आज तुम्हें किसकी प्रसन्नता करनी चाहिए? अथवा किसने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया? तुम्हारे उपकारों में से किसकी आज तुम्हारी मनोवांछित इच्छा पूरी होनी चाहिए अथवा किस पापी को अत्यंत अप्रिय एवं कठोर दंड दिया जाना चाहिए?॥31 1/2॥
 
‘Or tell me, whom should you please today? Or who has done you no favours? Which of your benefactors should be granted your desired wish today or which wrongdoer should be given a very unpleasant and harsh punishment?॥ 31 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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