श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 10: राजा दशरथ का कैकेयी के भवन में जाना, उसे कोपभवन में स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकार से सान्त्वना देना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  2.10.29-30h 
यदिदं मम दु:खाय शेषे कल्याणि पांसुषु।
भूमौ शेषे किमर्थं त्वं मयि कल्याणचेतसि॥ २९॥
भूतोपहतचित्तेव मम चित्तप्रमाथिनि।
 
 
अनुवाद
'कल्याणी! मुझे इस प्रकार कष्ट पहुँचाने के लिए तुम धूल में लोटने का क्या कारण है? हे सुन्दरी, जो मेरे मन को व्यथित कर रही हो! मैं सदैव तुम्हारे कल्याण के बारे में सोचता हूँ। फिर मेरे होते हुए तुम भूमि पर क्यों सो रही हो? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारे मन पर किसी राक्षस का कब्जा हो गया है।'
 
‘Kalyani! What is the reason that you are rolling in the dust to trouble me like this? Beautiful lady who is troubling my mind! I always think of your well-being. Then why are you sleeping on the ground when I am around? It seems that some demon has taken over your mind.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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