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ramayan 2.1.44: पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले महात्मा श्री राम अपनी समस्त प्रजा के प्रिय थे। राजा भली-भाँति समझते थे कि उनका सर्वप्रिय होना ही उनके आंतरिक दुःख पर विजय पाने में सहायक है ॥ 44॥   |   ramayan सर्ग 2.1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.1.44 
पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मन:।
लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले महात्मा श्री राम अपनी समस्त प्रजा के प्रिय थे। राजा भली-भाँति समझते थे कि उनका सर्वप्रिय होना ही उनके आंतरिक दुःख पर विजय पाने में सहायक है ॥ 44॥
 
Mahatma Shri Ram, who had a face as charming as the full moon, was loved by all his subjects. The king understood very well that his being loved by all helped him overcome his inner sorrow. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)