श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.1.34 
तमेवंवृत्तसम्पन्नमप्रधृष्यपराक्रमम्।
लोकनाथोपमं नाथमकामयत मेदिनी॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी (देवी भूमि तथा उसकी प्रजा) उन श्री रामजी को अपना स्वामी बनाना चाहती थी, जो ऐसे सदाचार से युक्त, बल में अजेय तथा जगत के रक्षकों के समान तेजस्वी थे॥34॥
 
Earth (Devi Bhumi and her subjects) wished to make Sri Rama, who was endowed with such virtuous conduct, invincible in power and as illustrious as the protectors of the world, their master. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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