श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  2.1.31-32 
नावज्ञेयश्च भूतानां न च कालवशानुग:।
एवं श्रेष्ठैर्गुणैर्युक्त: प्रजानां पार्थिवात्मज:॥ ३१॥
सम्मतस्त्रिषु लोकेषु वसुधाया: क्षमागुणै:।
बुद्धॺा बृहस्पतेस्तुल्यो वीर्ये चापि शचीपते:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
किसी भी प्राणी के मन में उनके प्रति तिरस्कार का भाव नहीं था । वे उनके वश में होकर काल के पीछे चलने वाले नहीं थे (काल स्वयं उनके पीछे चलता था )। इस प्रकार उत्तम गुणों से संपन्न होने के कारण राजकुमार श्री राम समस्त प्रजा और तीनों लोकों के प्राणियों द्वारा आदरणीय थे । उन्होंने अपने क्षमाशील गुणों से पृथ्वी को तुल्य कर दिया । बुद्धि में शचिपति बृहस्पति के समान और बल तथा पराक्रम में इन्द्र के समान थे । 31-32॥
 
No creature had any feeling of contempt towards him. They were not going to follow Kaal under his control (Kaal itself followed him). Thus, due to being endowed with excellent qualities, Prince Shri Ram was respected by all the subjects and the creatures of the three worlds. He equated the earth with his forgiving qualities. In intelligence, Sachipati was equal to Jupiter and in strength and prowess, Sachipati was equal to Indra. 31-32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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