| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार » श्लोक 16 |
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| | | | श्लोक 2.1.16  | कुलोचितमति: क्षात्रं स्वधर्मं बहु मन्यते।
मन्यते परया प्रीत्या महत् स्वर्गफलं तत:॥ १६॥ | | | | | | अनुवाद | | उनका मन अपने कुटुम्ब के आचार-विचार, दया, उदारता और शरणागतों की रक्षा में लगा रहता था। वे अपने क्षत्रिय धर्म को बहुत महत्व देते थे और उसी में विश्वास रखते थे। उनका विश्वास था कि उस क्षत्रिय धर्म का पालन करने से परम धाम की प्राप्ति होती है; अतः वे बड़े आनंद से उसी में लगे रहते थे॥ 16॥ | | | | His mind was focused on the conduct of his family, kindness, generosity and protection of those who sought refuge. He gave great importance to his Kshatriya Dharma and believed in it. He believed that by following that Kshatriya Dharma, one can attain the great heaven (Param Dham); hence, he used to remain engaged in it with great happiness.॥ 16॥ | | ✨ ai-generated | | |
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