श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 1: श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन, राजा दशरथ का श्रीराम को युवराज बनाने का विचार  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.1.13 
बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवद:।
वीर्यवान्न च वीर्येण महता स्वेन विस्मित:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वह बड़ा बुद्धिमान था और सदैव मधुर वचन बोलता था। अपने पास आनेवाले लोगों से वह पहले बात करता और ऐसी बातें कहता जिससे वे प्रसन्न हो जाते थे। बल और पराक्रम से संपन्न होने पर भी उसे अपने पराक्रम का कभी अभिमान नहीं हुआ॥13॥
 
He was very intelligent and always spoke sweet words. He would first talk to the people who came to him and would say such things that would please them. Even though he was blessed with strength and valour, he was never proud of his great valour.॥13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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