श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्तपुण्य लोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्र पर्वत को लौट जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.76.5 
आरोप्य स धनू राम: शरं सज्यं चकार ह।
जामदग्न्यं ततो रामं राम: क्रुद्धोऽब्रवीदिदम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर श्री रामजी ने उस पर बाण चढ़ाया और फिर क्रोधित होकर जमदग्निपुत्र परशुरामजी से इस प्रकार बोले -॥5॥
 
Having strung that bow, Shri Rama placed an arrow on its string. Then becoming angry he spoke thus to Parasurama, the son of Jamadagni -॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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