श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्तपुण्य लोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्र पर्वत को लौट जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.76.3 
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेज: पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'भार्गव! मैं क्षत्रिय धर्म से युक्त हूँ (इसीलिए मैं आप ब्राह्मणदेव के सामने विनीत भाव से कुछ नहीं बोल रहा हूँ), फिर भी आप मुझे शक्तिहीन और असमर्थ समझकर मेरा अपमान कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम तो देखिये।'॥3॥
 
'Bhargava! I am endowed with the dharma of a Kshatriya (that is why I am being humble and not saying anything in front of you Brahmin-God), yet you are insulting me by considering me powerless and incapable. Well, now see my glory and valour'॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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