श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 76: श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्तपुण्य लोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्र पर्वत को लौट जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.76.14 
सोऽहं गुरुवच: कुर्वन् पृथिव्यां न वसे निशाम्।
तदाप्रभृति काकुत्स्थ कृता मे काश्यपस्य ह॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'ककुत्स्थकुलनन्दन! तब से मैं अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का पालन करते हुए रात्रि में पृथ्वी पर कभी नहीं रहता; क्योंकि यह सर्वविदित है कि मैंने कश्यपजी के समक्ष प्रतिज्ञा की है कि रात्रि में पृथ्वी पर नहीं रहूँगा॥ 14॥
 
'Kakutsthakulanandan! Since then, obeying this order of my Guru Kashyapji, I never stay on the earth at night; because it is well known that I have pledged in front of Kashyapji that I will not stay on the earth at night.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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