श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 73: श्रीराम आदि चारों भाइयों का विवाह  »  श्लोक 32-34h
 
 
श्लोक  1.73.32-34h 
शत्रुघ्नं चापि धर्मात्मा अब्रवीन्मिथिलेश्वर:॥ ३२॥
श्रुतकीर्तेर्महाबाहो पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।
सर्वे भवन्त: सौम्याश्च सर्वे सुचरितव्रता:॥ ३३॥
पत्नीभि: सन्तु काकुत्स्था मा भूत् कालस्य पर्यय:।
 
 
अनुवाद
तब धर्मात्मा मिथिलेश ने शत्रुघ्न से कहा - 'महाबाहो! आप अपने हाथों से श्रुतकीर्तिका का जल ग्रहण करें। आप चारों भाई शान्तचित्त हैं। आप सबने उत्तम व्रत का भलीभाँति पालन किया है। ककुत्स्थ कुल के रत्न, आप चारों भाइयों को अपनी पत्नी के साथ मिल जाना चाहिए। इस कार्य में विलम्ब नहीं करना चाहिए। 32-33 1/2॥
 
Then the virtuous Mithilesh addressed Shatrughna and said – 'Mighty-armed! You take the water of Shrutkirtika with your own hands. All four of you brothers are peaceful. All of you have observed the Uttam Vrat very well. You four brothers, the jewels of Kakutstha clan, should unite with your wife. There should be no delay in this work. 32-33 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas