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श्लोक 1.73.31-32h  |
तमेवमुक्त्वा जनको भरतं चाभ्यभाषत॥ ३१॥
गृहाण पाणिं माण्डव्या: पाणिना रघुनन्दन। |
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| अनुवाद |
| जनक ने लक्ष्मण से ऐसा कहकर भरत से कहा- 'रघुनन्दन! 'मांडावी का हाथ अपने हाथ में लो।' |
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| Having said this to Lakshmana, Janaka said to Bharata - 'Raghunandan! Take Mandavi's hand in yours.' |
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