श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 73: श्रीराम आदि चारों भाइयों का विवाह  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  1.73.14-15 
क: स्थित: प्रतिहारो मे कस्याज्ञां सम्प्रतीक्षते।
स्वगृहे को विचारोऽस्ति यथा राज्यमिदं तव॥ १४॥
कृतकौतुकसर्वस्वा वेदिमूलमुपागता:।
मम कन्या मुनिश्रेष्ठ दीप्ता बह्नेरिवार्चिष:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'महान्! मेरे यहाँ महाराज की सेवा में कौन-सा रक्षक खड़ा है? वह किसकी आज्ञा का इंतजार कर रहा है? आपके घर आने का क्या विचार है? यह राज्य जैसे मेरा है, वैसे ही आपका भी है। मेरी पुत्रियों का विवाह-सूत्र-बंधन का शुभ कार्य पूर्ण हो चुका है। अब वे यज्ञवेदी के पास आकर बैठ गई हैं और प्रज्वलित अग्नि की ज्वालाओं के समान चमक रही हैं॥ 14-15॥
 
‘Great sage! Which guard is standing for Maharaj at my place? Whose orders does he wait for? What is the thought of coming to your house? This kingdom is yours just as it is mine. The auspicious act of tying the knot of marriage of my daughters has been completed. Now they have come and sat near the sacrificial altar and are shining like the blazing flames of fire.॥ 14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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