श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 72: विश्वामित्र द्वारा भरत और शत्रुज के लिये कुशध्वज की कन्याओं का वरण,राजा दशरथ का अपने पुत्रों के मंगल के लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.72.8 
उभयोरपि राजेन्द्र सम्बन्धेनानुबध्यताम्।
इक्ष्वाकुकुलमव्यग्रं भवत: पुण्यकर्मण:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
‘राजन्! इन दोनों भाइयों (भरत और शत्रुघ्न) को अपनी कन्या देकर सम्पूर्ण इक्ष्वाकु वंश को अपने सम्बन्ध से बाँध लीजिए। आप पुण्यात्मा पुरुष हैं, आपके मन में यह चिन्ता न हो (अर्थात् आपको यह सोचकर चिन्ता न हो कि मैं ऐसे महान सम्राट के साथ एक ही समय में चार वैवाहिक सम्बन्ध कैसे निभा सकता हूँ।)’॥8॥
 
‘King! By giving away your daughter to these two brothers (Bharat and Shatrughna) you should bind the entire Ikshvaku clan with your relationship. You are a man of pious deeds; your mind should not be anxious (that is, you should not be anxious thinking how can I maintain four marital relationships with such a great emperor at the same time.)’॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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