श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 72: विश्वामित्र द्वारा भरत और शत्रुज के लिये कुशध्वज की कन्याओं का वरण,राजा दशरथ का अपने पुत्रों के मंगल के लिये नान्दीश्राद्ध एवं गोदान करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.72.15 
परो धर्म: कृतो मह्यं शिष्योऽस्मि भवतोस्तथा।
इमान्यासनमुख्यानि आस्यतां मुनिपुंगवौ॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'आपने कन्याओं का विवाह करके मेरे लिए महान् कर्तव्य पूरा किया है; मैं आप दोनों का शिष्य हूँ। हे मुनियों! आप इन उत्तम आसनों पर विराजमान होइए॥15॥
 
‘By arranging the marriage of the girls, you have accomplished a great duty for me; I am a disciple of both of you. O sages! Please sit on these excellent seats.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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