श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 70: राजा जनक का अपने भाई कुशध्वज को सांकाश्या नगरी से बुलवाना,वसिष्ठजी का श्रीराम और लक्ष्मण के लिये सीता तथा ऊर्मिला को वरण करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.70.4 
तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मत:।
प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मैं इस शुभ अवसर पर वहाँ रहने वाले अपने भाई को यहाँ उपस्थित देखना चाहता हूँ; क्योंकि मेरी दृष्टि में वही मेरे इस यज्ञ का रक्षक है। महाबली कुशध्वज भी मेरे साथ श्री सीताराम के विवाह के इस शुभ समारोह का आनन्द लेंगे।॥4॥
 
'I want to see my brother who lives there present here on this auspicious occasion; because in my view he is the protector of this sacrifice of mine. The mighty Kushadhwaj will also enjoy this auspicious ceremony of the marriage of Shri Sita Ram with me.'॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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