श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 70: राजा जनक का अपने भाई कुशध्वज को सांकाश्या नगरी से बुलवाना,वसिष्ठजी का श्रीराम और लक्ष्मण के लिये सीता तथा ऊर्मिला को वरण करना  »  श्लोक 31-33
 
 
श्लोक  1.70.31-33 
तत: शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनि:॥ ३१॥
भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रित:।
तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम्॥ ३२॥
ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम्।
तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उस समय भृगु वंश में उत्पन्न महर्षि च्यवन उस सुन्दर एवं महान पर्वत पर तपस्यारत थे। उनका आश्रम हिमालय पर ही था। उन दो रानियों में से एक (जिन्हें विष दिया गया था) कालिंदी नाम से प्रसिद्ध थी। खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाली महाकालिंदी को एक श्रेष्ठ पुत्र की इच्छा हुई। वह भृगु पुत्र च्यवन के पास गई, जो देवों के समान तेजस्वी थे, और उन्हें प्रणाम किया।
 
‘At that time, the great sage Chyavana, born in the Bhrigu clan, was engaged in penance on that beautiful and great mountain. His hermitage was on the Himalayas itself. One of those two queens (who was poisoned) was famous by the name Kalindi. The great Kalindi, who had eyes like the blooming lotus petals, desired to have an excellent son. She went to Chyavana, son of Bhrigu, who was as radiant as a god, and bowed to him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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