श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 70: राजा जनक का अपने भाई कुशध्वज को सांकाश्या नगरी से बुलवाना,वसिष्ठजी का श्रीराम और लक्ष्मण के लिये सीता तथा ऊर्मिला को वरण करना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  1.70.2-3 
भ्राता मम महातेजा वीर्यवानतिधार्मिक:।
कुशध्वज इति ख्यात: पुरीमध्यवसच्छुभाम्॥ २॥
वार्याफलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमतीं नदीम्।
सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्मन्! मेरे महापराक्रमी भाई कुशध्वज, जो अत्यन्त पुण्यात्मा हैं, इस समय इक्षुमती नदी का जल पीकर उसी के तट पर स्थित शुभ सांकाश्य नगर में निवास कर रहे हैं। उसके चारों ओर की दीवारों की रक्षा के लिए शत्रुओं का नाश करने में समर्थ विशाल यन्त्र स्थापित किए गए हैं। वह सम्पूर्ण पुष्प विमान के समान विशाल और स्वर्ग के समान सुन्दर है, जो पुण्य से प्राप्त होता है। 2-3॥
 
'Brahman! My great and valiant brother Kushadhwaj, who is a very pious soul, currently lives in the auspicious Sankashya city situated on its banks, drinking the water of the Ikshumati river. To protect the walls around it, huge machines capable of warding off enemies have been installed. That whole flower is as vast as a plane and as beautiful as heaven, which is attained by virtue. 2-3॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas