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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम के द्वारा धनुर्भंग तथा राजा जनक का विश्वामित्र की आज्ञा से राजा दशरथ को बुलाने के लिये मन्त्रियों को भेजना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.67.8 
इदं धनुर्वरं ब्रह्मञ्जनकैरभिपूजितम्।
राजभिश्च महावीर्यैरशक्तै: पूरितं तदा॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्मन्! यह सर्वश्रेष्ठ धनुष है, जिसकी पूजा जनकवंश के राजाओं ने सदैव की है तथा पूर्वकाल में जो महाबली राजा इसे उठाने में असमर्थ थे, उन्होंने भी इसका आदर किया है।
 
'Brahman! This is the best bow which has always been worshipped by the kings of Janaka's dynasty and even those mighty kings who were unable to lift it have respected it in the past.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)