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ramayan 1.65.36: 'भगवन्! आपकी अद्भुत कथाएँ सुनकर मैं तृप्त नहीं हुआ; परन्तु हे मुनि! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्य अस्त हो रहा है।   |   ramayan सर्ग 1.65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.65.36 
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो।
कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
'भगवन्! आपकी अद्भुत कथाएँ सुनकर मैं तृप्त नहीं हुआ; परन्तु हे मुनि! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्य अस्त हो रहा है।
 
'Lord! I am not satisfied with listening to your wonderful stories; but, O great sage! It is time for the yagya, the sun is setting.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)