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ramayan 1.65.30-31h: ऐसा कहकर महान एवं तेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी मौन हो गए। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्री राम और लक्ष्मण के पास हाथ जोड़कर विश्वामित्र जी से कहा - 30 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  1.65.30-31h 
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तम:।
शतानन्दवच: श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ॥ ३०॥
जनक: प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम्।
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर महान एवं तेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी मौन हो गए। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्री राम और लक्ष्मण के पास हाथ जोड़कर विश्वामित्र जी से कहा - 30 1/2॥
 
Saying this, the great and brilliant Vipravar Shatanandji became silent. Hearing this story from the mouth of Shatanand ji, Maharaj Janak folded his hands near Shri Ram and Lakshman and said to Vishwamitra ji - 30 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)