श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 64: विश्वामित्र का रम्भा को शाप देकर पुनः घोर तपस्या के लिये दीक्षा लेना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.64.17 
बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते।
नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब उनकी तपस्या भंग हुई, तब उनके मन में यह विचार आया कि 'अब से मैं किसी भी परिस्थिति में न तो क्रोध करूँगा और न कुछ बोलूँगा ॥ 17॥
 
When his tapasya was abducted, this thought came up in his mind that 'From now on I will neither get angry nor speak anything under any circumstances.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)