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बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते।
नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन॥ १७॥
अनुवाद
जब उनकी तपस्या भंग हुई, तब उनके मन में यह विचार आया कि 'अब से मैं किसी भी परिस्थिति में न तो क्रोध करूँगा और न कुछ बोलूँगा ॥ 17॥
When his tapasya was abducted, this thought came up in his mind that 'From now on I will neither get angry nor speak anything under any circumstances.॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥