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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.63.6 
कन्दर्पदर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत्।
अप्सर: स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उसे देखते ही ऋषि विश्वामित्र कामातुर हो गये और उससे इस प्रकार बोले - 'अप्सरा! तुम्हारा स्वागत है; आओ और मेरे आश्रम में निवास करो।
 
On seeing her, sage Vishwamitra became overcome with lust and spoke to her thus - 'Apsara! You are most welcome; come and reside in my hermitage.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)