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श्लोक 1.63.6  |
कन्दर्पदर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत्।
अप्सर: स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| उसे देखते ही ऋषि विश्वामित्र कामातुर हो गये और उससे इस प्रकार बोले - 'अप्सरा! तुम्हारा स्वागत है; आओ और मेरे आश्रम में निवास करो। |
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| On seeing her, sage Vishwamitra became overcome with lust and spoke to her thus - 'Apsara! You are most welcome; come and reside in my hermitage. |
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