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श्लोक 1.63.26  |
रम्भामप्सरसं शक्र: सर्वै: सह मरुद्गणै:।
उवाचात्महितं वाक्यमहितं कौशिकस्य च॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय इन्द्र ने समस्त मरुतों के साथ मिलकर अप्सरा रम्भा से कुछ ऐसी बात कही जो उनके लिए लाभदायक तथा विश्वामित्र के लिए हानिकारक थी। |
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| At that time Indra, accompanied by all the Maruts, spoke to the Apsara Rambha something that was beneficial for himself and harmful for Viswamitra. 26. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिषष्टितम: सर्ग:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६३॥ |
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