श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  1.63.23-24 
घर्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रय:॥ २३॥
शिशिरे सलिलेशायी रात्र्यहानि तपोधन:।
एवं वर्षसहस्रं हि तपो घोरमुपागमत्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
ग्रीष्म ऋतु में वे पंचाग्निका का सेवन करते, वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे रहते और शीत ऋतु में दिन-रात जल में खड़े रहते। इस प्रकार उस तपस्वी ने एक हजार वर्ष तक घोर तप किया॥23-24॥
 
In summers he would consume Panchagnika, in rainy season he would stay under the open sky and in winters he would stand in water day and night. In this way the ascetic performed severe penance for a thousand years.॥23-24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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