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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  1.63.22-23h 
विप्रस्थितेषु देवेषु विश्वामित्रो महामुनि:॥ २२॥
ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बो वायुभक्षस्तपश्चरन्।
 
 
अनुवाद
देवताओं के चले जाने के बाद, महर्षि विश्वामित्र पुनः कठोर तपस्या में लग गए। वे बिना किसी सहारे के, अपनी भुजाएँ ऊपर उठाए, केवल वायु पीकर तपस्या में लीन हो गए।
 
After the gods left, the great sage Vishwamitra once again started performing severe penance. He stood without any support, raising his arms and engaged himself in penance by drinking only air.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)