| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 1: बाल काण्ड » सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या » श्लोक 19-21h |
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| | | | श्लोक 1.63.19-21h  | ब्रह्मणस्तु वच: श्रुत्वा विश्वामित्रस्तपोधन:॥ १९॥
प्राञ्जलि: प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम्।
ब्रह्मर्षिशब्दमतुलं स्वार्जितै: कर्मभि: शुभै:॥ २०॥
यदि मे भगवन्नाह ततोऽहं विजितेन्द्रिय:। | | | | | | अनुवाद | | ब्रह्माजी के ये वचन सुनकर तपस्वी विश्वामित्र ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा, 'हे प्रभु! यदि आप मेरे पुण्य कर्मों के कारण मुझे ब्रह्मर्षि का अतुलनीय पद प्रदान कर दें, तो मैं अपने को इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला मानूँगा।' | | | | On hearing these words of Brahma, the ascetic Visvamitra folded his hands and bowed before him and said, 'O Lord! If, by reason of the good deeds I have done, you can grant me the incomparable position of a Brahmarshika, then I will consider myself to be the one who has conquered his senses.' | | ✨ ai-generated | | |
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