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ramayan 1.63.16-17h: सब देवता और ऋषिगण आपस में विचार करने लगे, ‘कुशिकानंदन विश्वामित्र को महान ऋषि का पद प्राप्त करना चाहिए, यही उनके लिए उत्तम बात होगी।’ ॥16 1/2॥   |   ramayan सर्ग 1.63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या   ।   ramayan काण्ड 1: बाल काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  1.63.16-17h 
आमन्त्रयन् समागम्य सर्वे सर्षिगणा: सुरा:॥ १६॥
महर्षिशब्दं लभतां साध्वयं कुशिकात्मज:।
 
 
अनुवाद
सब देवता और ऋषिगण आपस में विचार करने लगे, ‘कुशिकानंदन विश्वामित्र को महान ऋषि का पद प्राप्त करना चाहिए, यही उनके लिए उत्तम बात होगी।’ ॥16 1/2॥
 
All the gods and sages began to discuss among themselves, 'Kushikanandana Visvamitra should attain the position of a great sage, this would be the best thing for him.' ॥16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)