श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  1.63.15-16h 
तस्य वर्षसहस्राणि घोरं तप उपासत:॥ १५॥
उत्तरे पर्वते राम देवतानामभूद् भयम्।
 
 
अनुवाद
श्री राम! वहाँ उत्तर पर्वत पर एक हजार वर्षों से घोर तपस्या में लीन विश्वामित्र से देवतागण बहुत भयभीत थे।
 
Sri Rama! There on the Uttar mountain, the gods were greatly afraid of Vishwamitra who was engaged in severe penance for a thousand years. 15 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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