श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  1.63.14-15h 
स कृत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं जेतुकामो महायशा:॥ १४॥
कौशिकीतीरमासाद्य तपस्तेपे दुरासदम्।
 
 
अनुवाद
वहाँ उन महामुनि ने अपने दृढ़ मन का आश्रय लेकर कौशिकी नदी के तट पर जाकर कामदेव को जीतने के लिए घोर तपस्या आरम्भ की ॥14 1/2॥
 
There, that great sage, taking the help of his determined mind, went to the banks of Kaushiki and started his formidable penance to conquer Kamadeva. 14 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd