श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  1.63.11-12h 
अहोरात्रापदेशेन गता: संवत्सरा दश॥ ११॥
काममोहाभिभूतस्य विघ्नोऽयं प्रत्युपस्थित:।
 
 
अनुवाद
मैं विषयासक्ति से इतना ग्रस्त हो गया था कि मेरे दस वर्ष दिन-रात के समान बीत गए। यह मेरी तपस्या में बड़ी बाधा बन गई।॥11 1/2॥
 
'I was so overcome by lustful attachment that my ten years passed like day and night. This became a great obstacle in my penance.'॥ 11 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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