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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 63: विश्वामित्र को ऋषि एवं महर्षिपद की प्राप्ति, मेनका द्वारा उनका तपोभंग तथा ब्रह्मर्षिपद की प्राप्ति के लिये उनकी घोर तपस्या  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  1.63.10-11h 
बुद्धिर्मुने: समुत्पन्ना सामर्षा रघुनन्दन॥ १०॥
सर्वं सुराणां कर्मैतत् तपोऽपहरणं महत्।
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! ऋषि का मन क्रोध से भर गया और उन्होंने सोचा, 'यह सब देवताओं का काम है। उन्होंने हमें हमारी तपस्या से हरण करने के लिए यह महान प्रयास किया है।' 10 1/2
 
Raghunandan! The sage's mind was filled with anger and he thought, 'All this is the work of the gods. They have made this great effort to abduct us from our penance.' 10 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)