श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 1: बाल काण्ड  »  सर्ग 61: विश्वामित्र की पुष्कर तीर्थ में तपस्या तथा राजर्षि अम्बरीष का ऋचीक के मध्यम पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाने के लिये खरीदकर लाना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  1.61.22-23 
अथ राजा महाबाहो वाक्यान्ते ब्रह्मवादिन:।
हिरण्यस्य सुवर्णस्य कोटिभी रत्नराशिभि:॥ २२॥
गवां शतसहस्रेण शुन:शेपं नरेश्वर:।
गृहीत्वा परमप्रीतो जगाम रघुनन्दन॥ २३॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु रघुनन्दन! अपने मझले पुत्र की यह बात सुनकर राजा अम्बरीष बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने शुनःशेप को एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ, रत्नों का ढेर और एक लाख गौएँ देकर अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
 
Mahabahu Raghunandan! King Ambrish was very pleased at hearing his middle son say this and he took Shuna Shepa in exchange of one crore gold coins, heaps of gems and one lakh cows and proceeded towards home.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)